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सोमवार, 24 जून 2013

एक और नमाज़ी डूब गया

इबादतगाह में देखो एक और नमाज़ी डूब गया
दुआ मेरी भी कबूल हुई, एक गैर समाजी डूब गया

कैसे मंदिर, कैसी मस्जिद, जगह सब ठेकेदारों की है
पाप धोते धोते वो, एक और रिवाजी डूब गया

उमड़ते ये सैलाब नहीं, ये ऊपर वाले की बोली है
बाकि तो सब समझ गए थे, वो एक न-समाझी डूब गया 

सैलाब खुदा के भी घर में

खुदा के रास्ते पे यूँ ही  मत चला करो
किसी शाम हम से भी मिला करो 

आते हैं सैलाब खुदा के भी घर में 
तुम शामों को अक्सर,  मयकदों में मिला करो

अक्सर याद आती है वो,  गर इबादत के दर्मियान
कर के वजू फिर तुम, उसके ही सजदे किया  करो

जो तुम सब को दिखलाते हो, वो तुम तो नहीं कोई और है
खुद तुम, खुद बनकर रहा करो, जब तुम  मुझ से मिला करो










सिगरेट

सर्द हवाओं में उड़ती 
मेरे सिगरेट की  चिंगारियाँ 
अक्सर मुझ से ही 
उलझ जाया करती है 
मांगती है हिसाब कभी मेरी 
साँसों का और कभी 
मेरी सांस ही बन 
जाया करती है 

पुराने अखबार सा 
बिछाया था तुमने
मुझको अपने जीवन में 
ये चिंगारियां अब  अक्सर 
उस अखबार को 
जलाया करती है 

ये तारीखों की 
फितरत है की वो 
रोज़ बदल जाया करती है   
मेरी सारी चेतना अब 
तुमको केलिन्डर सा 
पाया करती है 

माचिस की डब्बी 
पे बने गुलाब से 
दिल को बहलाना और 
खुलते ही डिब्बी 
माचिस की तीलियाँ 
मेरी सिगरेट जलाया करती है 


आज भी मैं बारिशों का इंतज़ार करता हूँ

आज भी बारिशों का 
मैं इंतज़ार करता हूँ 
तुम मिलोगी फिर  कभी 
किसी बारिश में भीगती 
यही दुआ मैं खुदा  से 
बार बार करता हूँ 

अचानक सी बारिश में 
भीगते से  दो बदन 
मौसमों से ऐसी 
साजिशों की 
दुआ मैं बार बार 
करता हूँ 

कुछ न हो दरमियाँ हमारे 
सिर्फ साँसों का सैलाब हो 
सिगरेट के धुंए जैसे 
उस पल की दुआ 
मैं बार बार 
करता हूँ 

आज भी मैं बारिशों का इंतज़ार करता हूँ 




सो सो तब तब होना है


 तुम्हारे ख्वाबों से मुझको 
 अक्सर नींद आ जाती थी 
आज तुम्हारे ख्वाबों ने मुझको 
 नींद से जगा दिया 
मेरे आँखों की नमी
अब तक सुखी थी नहीं
कि  तुम्हारे ख्याल ने 
फिर मुझको रुला दिया
दिल क जज्बातों को कैसे 
अल्फाजों में बयान करूँ 
दर्द के सिरहाने रखकर 
जज्बातों को सुला दिया 
सूखे हुए दिल को अब 
शराब में भिगोना है 
बमुश्किल मिली है मुझको राहत 
इसको अब नहीं खोना है
 जो जो जब जब 
लिखा है उसने 
सो सो तब तब 
होना है