Popular Posts

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

तुम्हे आ जाना चाहिए



बुझती आँखों को अब क्या ख्वाब दिखाना चाहिए?

रात के मुसाफिर को अब घर आ जाना चाहिए !!


खुश्क मौसम की सर्द रातें अब मुझको सताती हैं

जो रात को उठकर लिखते थे

वो ख़त अब जलाना चाहिए !!


पहर दर पहर मैं देता रहा तुम को आवाजें

उन आवाजों को अब तो

लौट के आ जाना चाहिए !!



मेरे ख्वाबों की चाँद लाशें सड़ रहीं हैं आज भी

इन की चिता को आग लगाने

तुम्हे अब आ जाना चाहिए !!













शनिवार, 8 मई 2010

नयी कवितायेँ उधार की !

पिछले पूरे साल से मैंने कुछ नहीं लिखा है। आप इससे आलस्य भी कह सकतें हैं और महानगर में रहने की व्यस्तता भी कह सकते हैं। मैंने अपने ब्लॉग को जीवीत रखने के लिए एक कदम उठाया है । मैं अपने पिताजी के ब्लॉग से कुछ कवितायेँ ली हैं और इन्हें अपने ब्लॉग पे प्रेषित कर रहा हूँ। आप इन कविताओं को उनके ब्लॉग पे भी पढ़ सकते हैं। http://hameshaaa.blogspot.com/


इस कदम से मेरा ब्लॉग भी जीवीत रहेगा और आप लोगो को नयी और उम्दा किस्म की कवितायेँ पढ़ने मिलेंगी। जब स्वयं कुछ लिखूंगा तो आपको लिखने के स्तर से ही पता चल जायेगा और मैं स्वयं इमानदारी से आप को बता भी दूंगा।
तब तक आप लोग इन स्तरीय कविताओं का आनंद उठाएं।


प्राचीन महल का वैभव खंडहर में बदल गया है
कभी तन के खड़ा था हिमालय
सा आज रेत के पर्वत सा बिखर गया
है उसकी इस दशा पर सभी तो मौन हैं
कुछ हमदर्दी दिखाएँ
साथ में दो आसूं बहायें
ऐसा इस अपनो की दुनिया में बताओ तो भला कौन है
मैं हमदर्दी हो सकता हूँ
थोड़ा साथ दे सकता हूँ
पर आंसू बहाने को मुझसे मत कहना
मेरे आंसूं सुख चुकें हैं
कुछ जमा है फिक्स डेपोसित में
ताकि अपनी ही मौत पर फूल न चढ़ा सकूं
बाज़ार से खरीदा कर
तो अपने आंसू तो बहा सकूं
हाँ, मेरा स्नेह नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
क्यूँ की चौराहे की हवा अब सहन नही होती
मेरी लौ होती है विचलित
होती है कम्पित
मेरा स्नेह अभी नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
तुमको करना है प्रकाशित
आतीत के वैभव को
मेरा क्या!मैं तो टोटके क़ा दीपक हूँ
मेरा बुझ जाना ही अच्छा!
लो! मैं बुझता हूँ।

सोमवार, 24 अगस्त 2009

अनकही

दर्द वो है जो दीवारों सा दिखायी नही देता
बादलों सा बरसता तो है झूम के
पर बारिशों सा सुनायी नही देता


दिल के दरख्तों में
मैंने सपनो के बीज बोए थे
गम की फसलों के सिवाय यहाँ
अब कुछ दिखायी नही देता

सोचता हूँ की मांगूं बादलों से
थोड़ा पानी अपनी आँखों के लिए
पर सुना है की अब बदल कोई भी
यूँ ही उधार नही देता

रात के अंधेरे में किसी
रौशनी को उम्मीद न समझो
जलने के लिए कोई तिनका
अपना जिस्म बार बार नही देता

रास्तों पे चलते कारवां को
यूँ ही मंजीलें नही मिलती
नसीब मंजिलों का भी तो
देखो जिन्हें कारवां
हरबार नही मिलता …..

अब क्या करें

दिल में है जस्बात तो अब क्या करें
बदले नही अपने हालात तो अब क्या करें

कैसें दे अब चिरागों को हम होंसला
हवाएं हो गई है बेबाक तो अब क्या करें

तुम बताओ की परदों के पीछे क्या है
तुम बस परदों से करते रहे बात तो अब क्या करें

चैन की नींद में मैंने कुछ सपने उगाये थे
फसलें बिक गई अपनी तों हातो हाथ तो अब क्या करें

चाँद बुझ के सो गया , तारें जमीन पे आ गए
जिंदगी चलती रही रातों रात तो अब क्या करें

मैं तेरी यादों को माय समझ के पी गया
बातों में बस बढ़ गई बात तो अब क्या करें

बुधवार, 19 अगस्त 2009

मेरे घर के कमरे में


मेरे घर के कमरे में बिखरे हैं ख्वाब कुछ

आओ मिल कर समेटे आज कुछ

दरियों के नीचे से सपनो की धूल निकाले

तकियों के गिलाफों से उष्णता के फूल निकाले

रोशनदानो से बाहर देखे आज कुछ

मेरे घर के कमरे में.......

यादों के पौधों को थोडी सी धुप दिखा दें

अलमारी को किताबों की तहजीब सिखा दें

टूटे कांच में देखे आईने की तरह आज कुछ

मेरे घर के कमरे में .......

कमरे के फर्श को नए विचारों से धोया जाए

इसका कोना कोना नई उम्मीदों से संजोया जाए

घर की चौखट पे रंगोली से लिखें आज कुछ

मेरे घर के कमरे में बिखरे हैं ख्वाब कुछ..

ओल्ड

यूँ गुजर रही जिंदगी उसका ही नाम लेकर

मैं आज भी बैठा हूँ महफिल में एक टूटा जाम लेकर

तुम सजाओगी कभी महफिल मेरी मजार पर

कफ़न में लेटा हूँ आज भी मैं तेरी महफिल के दाम लेकर

बुधवार, 10 सितंबर 2008

सपने

बिक सकते तो बेंच देता
सपने तुम्हारे
मैं बाज़ार में
और फिर खरीद लाता
चन्द रोटी के टुकड़े
जो गिरते नही आस्मां से
आंसुओं को सुखा के
नमक कर लेता
अपने दर्द को पी के
मैं दम भर लेता
काश भुला सकता तो भुला देता
मैं जो ठगा गया
यहाँ सपनो के
बाज़ार में
जहाँ सपने खरीदे जा सकते हैं
पर बिक नही सकते
मैं तनहा सुखी नदी
के किनारे खड़ा
सोचता हूँ की
ये नदी बहती यदि
तो बहा देता सपने सारे
और चुका देता कीमत
धरातल के खुशियों की

बेनाम

वोह जो दिन हो उसे महफिल में बुलाया नही करते
हम शान से जीतें हैं गाया नहीं करते

यूँ तो होंगे कई फनकार तेरी महफिल में
हम यूँ ही अपना हुनर जाया नही करते


चाँद के पास ही रक्खा है दिल मेरा हुजुर
ऐसी बातों से ज़माने को बहलाया नही करते

मैंने कमरे में बिछाये हैं यादों के कई बिस्तर
यहाँ हर कसी को हम लिटाया नही करते

महफिल महफिल लोगों को हम गले लगाया करते हैं
उनकी बातों को मगर दिल से लगाया नही करते

बुधवार, 9 जुलाई 2008

तुम्हारी यादों सा आधा चाँद आज फिर आया है

लाया है साथ में कुछ बासी रातों के टूटे तारे और

कुछ रात-रानी के अध् खिले फूलों की जानी पहचानी खुशबू लाया है

सब कुछ वैसा ही है जैसा तुम छोड़ गए थे

छत की मुंडेर पे पड़े मेरे एहसास वैसी ही हैं

जैसा इन्हे तुम तोड़ गए थे

रुदाली सी सुर्ख हवा का रुदन

वैसा ही है पहर दर पहर

बीतें सालों में यहाँ कुछ भी नही बदला

तुम्हारी यादों को मैंने कुछ टूटी चूडियों के टुकडों में सहेजकर रख दिया है।

अब बस आधा एक चाँद है और टूटी कुछ चूडियां !!!

सोमवार, 21 अप्रैल 2008

उपहार

मेरे प्रियतम मुझे उपहार चाहिए
तुम्हारी साँसों से गुंथा जीवन का एक हार चाहिए

प्रेम भरे ये नयन तुम्हारे
इन नयनो का रस-बहार चाहिए

रंगो से भरी मेरी स्वप्न-शाला
मेरे इन सपनों को जीवन का आकार चाहिए

मेरे प्रियतम मुझे उपहार चाहिए