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बुधवार, 30 नवंबर 2011

Mahamari

सुनो, सुनो सुनो! देशवासियों गौर से सुनो हमारे देश मैं एक बीमारी फ़ैल रही है! ये एक बहुत ही खतरनाक बीमारी है! जनता इसके संक्रमण से बच नहीं पा रही है। कई राज्य तो इसके चपेट में पूरी तरह से आ चुके हैं।
मैं बात कर रहा हूँ हजारिया नाम की बीमारी की। ये एक अन्ना नाम के विषाणु के संक्रमण से फ़ैल रही है। इस बीमारी का पता तभी चलता है जब व्यक्ति पूरी तरह से संक्रमित हो जाता है। संक्रमण की स्थिति में व्यक्ति सफ़ेद रंग की गाँधी टोपी पहन लेता है जिस पर अन्ना लिखा होता है। अतिसंक्रमण की स्थिति में वह जुलुस निकलता है, रैलियों में शामिल होता है और अन्ना के सुप्पोर्ट में फसबूक पर लोगो को वर्गालाता है। अपनी डिस्प्ले पिक में हर जगह अन्ना की पिक लगता है और नारे लिखता है।
धीरे धीरे संक्रमण पूरी तरह से व्यक्ति को जकड लेता है और वह इस बीमारी का मजा लेने लगता है सफ़ेद कुरता पायजामा पहनता है और इनकी सभी सभाओं में जाता है। ऐसी अवस्था में वह सरकार की नीतियों का विरोध करता है और अधिकांशतः कांग्रेस के खिलाफ बोलने लगता है । इस बीमारी के चलते व्यक्ति का दिमाग धीरे धीरे भ्रमित होने लगता है और वह प्रत्येक नेता को चोर तथा स्वयं को गाँधी समझने लगता है। इस बीमारी की एक और भी अवस्था है जिसमे व्यक्ति स्वयं को कभी कभी भगत सिंह भी समझ लेता है।
अभी तक इस बिमारी के लिए कोई भी जांच देश में मौजूद नहीं है। लेकिन कुछ समाचार चैनल रोगी से मोबाइल द्वारा एस एम एस मंगवा कर इसकी जांच का दावा कर रहे हैं हलाकि सरकार ने इस जांच को अभी वैध नहीं ठराया है।
सरकार अपनी और से सभी संभव प्रयास कर रही है इस संक्रमण को रोकने के लिए। केंद्र सरकार ने लोगो को भरोसा दिलाया है की जल्द ही इस बीमारी से उन्हें निजात दिलाई जाएगी। सरकार ने साथ ही साथ सभी वरिष्ठ व्यग्यानिको से इस बीमारी का टिका इजाद करने के लिए कहा है।
इससे पहले रामदेव नामक संक्रमण फैलने से पहले सरकार ने उस पर काबू पा लिया इसका सारा श्रेया सरकार को जाता है जिसने शीघ्र हरकत mein aakar police द्वारा लोगो को टिके लगवाए और रातों रात इस बीमारी को मैदान से उखाड़ फेंका। यह संक्रमण दुबारा न फैले इसके भी पुख्ता इंतजामात सरकार ने कर लिए हैं।
अब सरकार ऐसे ही kisi tikakaran krayakram ko शुरू करने वाली है। ताकि इस बीमारी को भी जड़ से उखाड़ के फेका जा सके। डॉक्टर दिग्विजय सिंह के नेत्रत्व में सरकारी डॉक्टरों की पूरी एक टीम इस विषय में कार्य कर रही है। डॉक्टर दिग्विजय सिंह ऐसे बिमारियों के विशेषग्य हैं।

सरकार ने दावा किया है की अगस्त के मुकाबले अब नवम्बर में इस बीमारी के मामलों में अब कमी आई है। आंकड़े बताते हैं की अब केवल वही लोग जो, घर से मुक्त है तथा अपना जीवन जी चुकें हैं , इस बीमारी की चपेट में हैं। सरकार की यदि माने तो इस बीमारी के विषाणु कुछ दिनों बाद अपने अप ही कम हो jate hain। व्यक्ति यदि कार्यरत रहे और व्यस्त राहे टॉप ये बीमारी कभी नहीं लगती।

सरकार ने लोगो को सतर्क किया है की वो बेदिया तथा केजरिवाला इलाकों से दूर रहे। हालाँकि सरकार ने ये भी कहा है की भुशाना जैसे विषाणु से घबराने की जरूरत नहीं है क्यूँ की ये उस बैक्टेरिया परिवार का स्थायी सदस्य नहीं है और अकेले होने पर की शक्ति शीन हो जाती है।

हालाँकि इस बीमारी के चलते सरकार को विरोधी पार्टियों का रोष झेलना पड़ा है लेकिन सरकार ने आश्वस्त किया है की जल्द ही इस संक्रमण पर वह काबू पा लेगी और संसद का सत्र ख़तम होते होते इसका टीकाकरण कार्यक्रम भी लागु कर दिया जायेगा। साथ ही केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को ये निर्देश दिए हैं की इस बीमारी के मामलों को हलके में न ले और टीकाकरण कार्यक्रम लागु होने तक स्पेशल डॉक्टरों की टीम इन्हें सम्हाले।

सरकार के भरकस प्रयास और बढाती ठण्ड के चलते इस बीमारी का असर कम तो हुआ है लेकिन जब तक सरकार कोई ठोस कदम nahi uthati , जनता को हजेरिया झेलना ही पड़ेगा।

हम अपने पाठकों से निवेदन करते हैं की वो ऐसे सभी सभाओं से दूर रहे और संक्रमित व्यक्ति से भी door रहे क्यूँ की ये बीमारी vichaaron के आदान प्रदान से भी फैलती है और गैर सरकारी समाचारों का सेवन न करें।

आपका स्वास्थ्य ही देश का भविष्य है।

जनहित में जारी....


(लेखक का प्रयास सिर्फ देश हित में कार्य करना है)

शनिवार, 19 मार्च 2011

होली

ख्वाबों के कुछ चिथड़े
इस होली पे जला दिए
अरमानों के कुछ निशाँ थे,
इस्सी राख में दबा दिए
हाथ उठाकर आसमान के
कुछ रंगों को छु लिया
कुछ रंग बेरंग हो गए
कुछ दामन पे लगा लिए
तुम जो रंग बिखराते हो
वो रंग सारे कच्चे हैं
मैंने सारे पक्के रंग
अपने ऊपर लगा लिए
रंगों के इस खेल में
सारे रिश्ते रंग गए
मेरे दो चार ख़ास थे
तकिये के नीचे दबा दिए.
ख्वाबों के कुछ चिथड़े
इस होली में जला दिए

बुधवार, 28 जुलाई 2010

याद

मेरी यादों का नशा और भी गहराता गया
जो याद भी नहीं था, वो सब याद आता गया

ये यूँ हुआ, वो यूँ हुआ, की जो हुआ
और नहीं हुआ वो सब भी याद आता गया

वो अचानक सी बारिश, वो सड़क, वो पेड़
और सब कुछ, जो भी था, याद आता गया

तुम्हारी खुशबू में बसे कुछ लम्हात
अब भी ताज़े हैं
उस दिन के बारिश की तरह
और पहले प्यार का ताजापन याद आता गया

रविवार, 4 जुलाई 2010

वक़्त

बिखर गया है वो ताश के पत्तों सा मेरे आगे

कल जो खुद को खुदा कहता था

वो जोड़ रहा है अपने मुकद्दर की तस्वीरें

जिसके हाथों में कभी मेरा मुकद्दर रहता था

वक़्त है , वक़्त है और सिर्फ वक़्त है

कहते है की पहले वक़्त भी उसी के हाथों में रहता था

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

तुम्हे आ जाना चाहिए



बुझती आँखों को अब क्या ख्वाब दिखाना चाहिए?

रात के मुसाफिर को अब घर आ जाना चाहिए !!


खुश्क मौसम की सर्द रातें अब मुझको सताती हैं

जो रात को उठकर लिखते थे

वो ख़त अब जलाना चाहिए !!


पहर दर पहर मैं देता रहा तुम को आवाजें

उन आवाजों को अब तो

लौट के आ जाना चाहिए !!



मेरे ख्वाबों की चाँद लाशें सड़ रहीं हैं आज भी

इन की चिता को आग लगाने

तुम्हे अब आ जाना चाहिए !!













शनिवार, 8 मई 2010

नयी कवितायेँ उधार की !

पिछले पूरे साल से मैंने कुछ नहीं लिखा है। आप इससे आलस्य भी कह सकतें हैं और महानगर में रहने की व्यस्तता भी कह सकते हैं। मैंने अपने ब्लॉग को जीवीत रखने के लिए एक कदम उठाया है । मैं अपने पिताजी के ब्लॉग से कुछ कवितायेँ ली हैं और इन्हें अपने ब्लॉग पे प्रेषित कर रहा हूँ। आप इन कविताओं को उनके ब्लॉग पे भी पढ़ सकते हैं। http://hameshaaa.blogspot.com/


इस कदम से मेरा ब्लॉग भी जीवीत रहेगा और आप लोगो को नयी और उम्दा किस्म की कवितायेँ पढ़ने मिलेंगी। जब स्वयं कुछ लिखूंगा तो आपको लिखने के स्तर से ही पता चल जायेगा और मैं स्वयं इमानदारी से आप को बता भी दूंगा।
तब तक आप लोग इन स्तरीय कविताओं का आनंद उठाएं।


प्राचीन महल का वैभव खंडहर में बदल गया है
कभी तन के खड़ा था हिमालय
सा आज रेत के पर्वत सा बिखर गया
है उसकी इस दशा पर सभी तो मौन हैं
कुछ हमदर्दी दिखाएँ
साथ में दो आसूं बहायें
ऐसा इस अपनो की दुनिया में बताओ तो भला कौन है
मैं हमदर्दी हो सकता हूँ
थोड़ा साथ दे सकता हूँ
पर आंसू बहाने को मुझसे मत कहना
मेरे आंसूं सुख चुकें हैं
कुछ जमा है फिक्स डेपोसित में
ताकि अपनी ही मौत पर फूल न चढ़ा सकूं
बाज़ार से खरीदा कर
तो अपने आंसू तो बहा सकूं
हाँ, मेरा स्नेह नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
क्यूँ की चौराहे की हवा अब सहन नही होती
मेरी लौ होती है विचलित
होती है कम्पित
मेरा स्नेह अभी नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
तुमको करना है प्रकाशित
आतीत के वैभव को
मेरा क्या!मैं तो टोटके क़ा दीपक हूँ
मेरा बुझ जाना ही अच्छा!
लो! मैं बुझता हूँ।

सोमवार, 24 अगस्त 2009

अनकही

दर्द वो है जो दीवारों सा दिखायी नही देता
बादलों सा बरसता तो है झूम के
पर बारिशों सा सुनायी नही देता


दिल के दरख्तों में
मैंने सपनो के बीज बोए थे
गम की फसलों के सिवाय यहाँ
अब कुछ दिखायी नही देता

सोचता हूँ की मांगूं बादलों से
थोड़ा पानी अपनी आँखों के लिए
पर सुना है की अब बदल कोई भी
यूँ ही उधार नही देता

रात के अंधेरे में किसी
रौशनी को उम्मीद न समझो
जलने के लिए कोई तिनका
अपना जिस्म बार बार नही देता

रास्तों पे चलते कारवां को
यूँ ही मंजीलें नही मिलती
नसीब मंजिलों का भी तो
देखो जिन्हें कारवां
हरबार नही मिलता …..

अब क्या करें

दिल में है जस्बात तो अब क्या करें
बदले नही अपने हालात तो अब क्या करें

कैसें दे अब चिरागों को हम होंसला
हवाएं हो गई है बेबाक तो अब क्या करें

तुम बताओ की परदों के पीछे क्या है
तुम बस परदों से करते रहे बात तो अब क्या करें

चैन की नींद में मैंने कुछ सपने उगाये थे
फसलें बिक गई अपनी तों हातो हाथ तो अब क्या करें

चाँद बुझ के सो गया , तारें जमीन पे आ गए
जिंदगी चलती रही रातों रात तो अब क्या करें

मैं तेरी यादों को माय समझ के पी गया
बातों में बस बढ़ गई बात तो अब क्या करें

बुधवार, 19 अगस्त 2009

मेरे घर के कमरे में


मेरे घर के कमरे में बिखरे हैं ख्वाब कुछ

आओ मिल कर समेटे आज कुछ

दरियों के नीचे से सपनो की धूल निकाले

तकियों के गिलाफों से उष्णता के फूल निकाले

रोशनदानो से बाहर देखे आज कुछ

मेरे घर के कमरे में.......

यादों के पौधों को थोडी सी धुप दिखा दें

अलमारी को किताबों की तहजीब सिखा दें

टूटे कांच में देखे आईने की तरह आज कुछ

मेरे घर के कमरे में .......

कमरे के फर्श को नए विचारों से धोया जाए

इसका कोना कोना नई उम्मीदों से संजोया जाए

घर की चौखट पे रंगोली से लिखें आज कुछ

मेरे घर के कमरे में बिखरे हैं ख्वाब कुछ..

ओल्ड

यूँ गुजर रही जिंदगी उसका ही नाम लेकर

मैं आज भी बैठा हूँ महफिल में एक टूटा जाम लेकर

तुम सजाओगी कभी महफिल मेरी मजार पर

कफ़न में लेटा हूँ आज भी मैं तेरी महफिल के दाम लेकर