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रविवार, 3 अप्रैल 2016

वक़्त

उँगलियों से गिरती
वक़्त की बूंदों को
कलम की स्याही
में लिपटाकर मैं,
अक्सर सफहों में
जप्त कर लेता हूँ ।
मैंने कई बार
यूँ ही पागलपन में
तुमको भी जप्त
करना चाहा था
वो सफहों पे जहाँ
स्याही फैली है न
वही तुम्हारे निशाँ है
मेरी डायरी के कुछ
पन्ने कटे फटे है वहाँ
ऐसा लगता है कोई
भागा हैं यहाँ से
पुराना वक़्त साथ लिये।

शनिवार, 5 मार्च 2016

चाह

अब जहाँ मैं हूँ  
वहां से वापस
आ नहीं सकता 
चाहता तो हूँ अब भी 
तुम्हे उतना ही
 पर अब तुम्हे 
मैं पा नहीं सकता
 
तुम्हारे मेरे दरमियां 
ये जो फासले है 
छू  तो सकता हूँ  इन्हे 
पर सिमटा नहीं सकता 

उन किताबों के सफहों से 
वक़्त की सौंधी खुशबु 
आती है मुझे 
उन किताबों को आज भी 
पढ़ तो सकता हूँ लेकिन 
उन्हें जला नहीं सकता 

गर मुझे मिलो कभी तो 
मुझे अनदेखा करना 
मैं दुनिया को रिश्ते 
बता तो सकता हूँ लेकिन 
उन्हें समझा नहीं सकता 

रविवार, 31 जनवरी 2016

सपने

मुझे मेरे सपने अब मिला नहीं करते
कई मौसम बदले मेरे शहर के लेकिन
फूल वो दिलों वाले अब खिला नहीं करते

पत्थर हो गए इंसा सब के सब
अब यहाँ ईद पर गले मिला नहीं करते

बच्चों सी है बातें इनकी
इनकी बातों का अब हम गिला नहीं करते

तार तार  हो गया है जिस्म छिल कर
जख्म कोई भी हो अब हम सिला नहीं करते।

शनिवार, 30 जनवरी 2016

तुम्हारे शहर मैं

मुझे छुपकर पढ़ने वाले
तेरे सीने के लफ्ज़ मैंने
सब सफ़ेद कागजो पर
ज्यों के त्यों उतारे है।
लिखी है तेरी चूड़ियों
की खनक और तेरी
बालियों की चमक
भी लिखी है मैंने
समुन्दर किनारे की
हवा में उड़ती तेरी
ज़ुल्फ़ों की महक
भी लिखी है मैंने
कई बार कई सफ़हे
खाली रख दिए यूँ ही
तू मिलेगा कभी तो
पूछूंगा कि कैसे गुजारे
कई साल मेरे बिन तूने
फिर उन खाली सफ़होँ
पर तुम्हारा खालीपन
भी लिखूंगा शायद
मैं जानता हूँ कि तू भी
कहीं लिखता रहता होगा
मेरे सीने की बुझी आग
और मेरे खालीपन की
कोई कहानी भी कहीं
लिख रखी होगी तूने
गर कभी मिले हम
तो बता देना की
खाली सफ़होँ का
मोल क्या होता है
तुम्हारे शहर  में

सोमवार, 25 जनवरी 2016

मेरे अंदर कौन है

मेरे अंदर कौन है बाहर कौन
मुझे जाना कहाँ है अब ये बतलाये कौन

शराबों के कई दौर यूँ ही ज़ाया हो गए
बात वो पते की अब सबको बतलाये कौन

वो गाँव सब के सब अब शहर हो गए
पर नींद वो गावों की अब शहरों में उगाये कौन

कल मयकदों से निकलकर  सब खुदा हो गए
दीवार ओ दर मस्जिदों की देखने अब रोज़ रोज़ जाये कौन

दोस्त तुमसे दोस्ती मेरी वैसी ही है गहरी
पर कौन जाए रोज़ मिलने किसी से
और रोज़ किसी को फ़ोन लगाये कौन।

मेरे अंदर कौन है बाहर कौन
मुझे जाना कहाँ है अब ये बतलाये कौन

अंशुमान 

सोमवार, 22 जून 2015

जिंदा किताबें

जिस्म रूह पर ऐसे है
पुरानी किताब पर
जिल्द चढ़ी हो जैसे
उम्र बढ़ रही है
तो वो कोने जो
अक्सर अलमारी
से रगड़ खाते है
छिल जाते  हैं
इस जिल्द पर
वक़्त की जो
धूल जमी है
वो आंसुओं की
बरसात में जब
भीग जाती है
तो उससे पुराने
वक़्त की सौंधी
खुशबु आती है
भिगाकर जब
सूख जाता है
नमकीन पानी
तो इस जिल्द पर
झुर्रियां निकल आती है
वैसे तो इस
किताब को अब
कोई पढ़ता नहीं है
कभी कोई अपना
छू लेता है
चंद सफ़हे पलट
लेता है और फिर
वापस रख देता है
कई बार तहज़ीब से
अलमारी से बाहर
झांकती इन किताबों की
यूँ तो कोई उम्र नहीं होती
लेकिन ये बहुत जगह
घेरती है दराजों में
जब ये रद्दी भी
न हो घर से बाहर
जाने के लिए
तो अक्सर लोग
इन किताबों को
जला देते है

जिस्म रूह पर ऐसे है 
पुरानी किताब पर 
जिल्द चढ़ी हो जैसे 







बुधवार, 10 जून 2015

पेचीदा से रिश्तेदार

यार तुम बड़े ही पेचीदा से रिश्तेदार हो
मिलकर भी कभी मिलते नहीं
चहरे तुम्हारे कभी खिलते नहीं
माना की तुम बड़े हो,
होशियार हो
यार तुम बड़े ही.………

मेरे बारे में,  मुझे छोड़कर
सबसे मुखातिब होते हो
छोटी छोटी बातों में
बच्चों की तरह रोते हो
यार तुम बड़े हो
होशियार हो
 लेकिन तुम बड़े ही। …

दीवारों पर सीलन की तरह
मत आया करो
और इल्जाम  बारिशों पर
तो बिलकुल भी
मत  लगाया करो
क्यों किसी से डरते हो
तुम तो खुद
अपनी सरकार हो
यार तुम बड़े ही.………

खुदा का खौफ रक्खो
मेरे बच्चों को
अच्छे तोहफे
दिया करो
बहुत असर होता है,
बुजुर्गो की दुआएं
लिया करो
कहीं ऐसा न हो कि
तुम्हारे पुरखों के
हश्र को तुम्हारा
इंतिज़ार  हो

यार तुम बड़े ही पेचीदा से रिश्तेदार हो






शुक्रवार, 5 जून 2015

वहां कोई होता तो होगा

पहाड़ों की चोटियों पर रात को 
कोई सोता तो होगा 
यहाँ तक आते हैं 
वहां के सन्नाटे 
कोई जरूर वहां 
रोता तो होगा 
इन घुमावदार रास्तों पर 
कई बार पानी को 
उतरते देखा है 
कई बार यहीं से 
कोहरे को ऊपर 
चढ़ते देखा है 
किसी को तो 
जाती होगी ये रसद 
वहां ऊपर जरूर 
कोई होता तो होगा 
चोटियों पर पहले 
आती है धूप 
किसी को तो 
जगाने  के लिए 
रजाई तान कर रात भर 
कोई वहां सोता तो होगा 




मंगलवार, 26 अगस्त 2014

उदास

मेरे शब्द उदास है
मन के किसी कोने में
रूखे हुए कुम्हले हुए
अपने दिन काट रहे है
मन के आँगन में
अब ये खेलते नहीं है
दिन ब दिन सिकुड़ जाते है
पर किसी की आहट पे
अब ये फैलते नहीं है
काली स्याह रात सा
मुक़द्दर रहा है इनका
चाँद सा मेहबूब रहा
तो उछले नहीं तो
ज़िन्दगी तिनका तिनका
अतीत की मशालों में
जलकर इन्होने
कई महफिले
रोशन की है अब
कुरेदता हूँ तो बस
राख है महफिले
कहीं नहीं है
वो जो मुह पे
रहते है दो चार
मेरे खास है
वैसे बहुत दिनों से
मेरे शब्द उदास है

बुधवार, 20 अगस्त 2014

अपने आप से

आज जो थोड़ा वक़्त मिला
तो गौर से आइना देखा
और जाना की वो शख्स
जो तमाम उम्र मेरे
साथ साथ चलता रहा था
ज़िन्दगी की खीच तान में
कहीं पीछे रह गया है
मैं अकेला बहुत
अकेला जी रहा हूँ

मैं जब बहुत छोटा था
तो तुम मेरे साथ हो लिए थे
नए नए खेल
सिखाते  थे
तुम मुझको
एक बार जब छत की
मुंडेर पे चढ़ गया था
तो तुमने मुझे
पकड़ लिया था अपनी
दोनों कलाइयो में
मुझे जप्त कर लिया था
मैं जब कभी अँधेरे से
डर  जाता था तो तुम
मुझे होंसला दिया
करते थे

स्कूल में भी तुम
मेरे साथ ही थे एकदम
रातों को जागकर जब
मैं पढता था तो तुम
कभी कभी आ जाते थे
मुझे देखने के लिए
तुमने ही मुझे उसूलों
की जगह जज़्बातों को
निभाना सिखाया है

वो भूरे आँखों वाली लड़की
जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी ,
तुमने ही तो बताया था की
मुझे उससे प्यार हो गया है
याद है उससे घंटो बाते करने के बाद
मैं घंटो तुम्हे उसकी एक ही बात
बार बार बताया करता था
पर तुम न कभी बोर हुए
न कभी इर्रिटेट हुए

बारिशों में घर से निकाल  देते थे
तुम मुझे भिगोने के लिए
और इसी तरह कई बार
मैंने भी अकेले मैं
आंसुओं से भिगोया है तुमको

मैं ये मानकर ही चल रहा था
की तुम मेरे साथ ही हो
पर आज अकेले में
कोई नहीं है
न तुम्हारी ख़ामोशी है
ना ही तुम्हारे सन्नाटे
और आइना देखा तो जाना कि
अकेला बहुत अकेला जी  रहा हूँ मैं !!