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मेरी ज़िंदगी में सुबह तो नही है पर राह में चमकते तारें बहुत हैं जो मिला दे उनसे वो राहे नही हैं पर पगडंडियों पे मशालें बहुत हैं मस्जिदों में ...
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अब किसके पास वक़्त है यहाँ अब कौन जनाजे में रोता है आज आफिस में काम बहुत है और एक दिन तो सबने मरना होता है ये तो इस कॉलोनी में रोज़ का...
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बेजान दीवारों पर खामोश परछाइयाँ मेरे तन्हाई की साथी बनी है परछाइयाँ तन्हाई में हमें यूँ वक़्त का तकाज़ा ना रहा दीवारों पर आकर वक़्त बता...
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बहती हवाओं से सीखा है उड़ती घटाओं से सीखा है बरसते पानी से जाना है झूमती बहारों ने माना है की प्रेम सिर्फ़ कल्पना है ये सच्चाई से परे है अन्...
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मेरे ख्वाहिशों के खतों पर पते गलत थे तुम जब तक मेरे साथ थे, मुझ से अलग थे मैंने कई बार खुदा बदलकर भी देखा तुमने जिनके सजदे किये वो सारे...
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जिस्म रूह पर ऐसे है पुरानी किताब पर जिल्द चढ़ी हो जैसे उम्र बढ़ रही है तो वो कोने जो अक्सर अलमारी से रगड़ खाते है छिल जाते हैं इस जिल...
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बुझती आँखों को अब क्या ख्वाब दिखाना चाहिए? रात के मुसाफिर को अब घर आ जाना चाहिए !! खुश्क मौसम की सर्द रातें अब मुझको सताती हैं जो रात को उठ...
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मेरी यादों का नशा और भी गहराता गया जो याद भी नहीं था, वो सब याद आता गया ये यूँ हुआ, वो यूँ हुआ, की जो हुआ और नहीं हुआ वो सब भी याद आता ग...
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शहर बदल सकते हैं राज्य बदल सकते हैं प्यार करने वाले साम्राज्य बदल सकते हैं जब तक रहा मैं, जिन्दगी मेला रही जिंदा लोग जिंदगी का भाग्य बदल सकत...
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वक्त ज़ख्म, वक्त ही दवा देता है जिन्दा है जो उन्हें जीने कि सजा देता है झुलस रहे हैं सदियों से कई जिस्म जिन्दगी कि आग में बुझते शोलों को वक्त...
बुधवार, 28 जुलाई 2010
याद
जो याद भी नहीं था, वो सब याद आता गया
ये यूँ हुआ, वो यूँ हुआ, की जो हुआ
और नहीं हुआ वो सब भी याद आता गया
वो अचानक सी बारिश, वो सड़क, वो पेड़
और सब कुछ, जो भी था, याद आता गया
तुम्हारी खुशबू में बसे कुछ लम्हात
अब भी ताज़े हैं
उस दिन के बारिश की तरह
और पहले प्यार का ताजापन याद आता गया
रविवार, 4 जुलाई 2010
वक़्त
बिखर गया है वो ताश के पत्तों सा मेरे आगे
कल जो खुद को खुदा कहता था
वो जोड़ रहा है अपने मुकद्दर की तस्वीरें
जिसके हाथों में कभी मेरा मुकद्दर रहता था
वक़्त है , वक़्त है और सिर्फ वक़्त है
कहते है की पहले वक़्त भी उसी के हाथों में रहता था
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
तुम्हे आ जाना चाहिए
बुझती आँखों को अब क्या ख्वाब दिखाना चाहिए?
रात के मुसाफिर को अब घर आ जाना चाहिए !!
खुश्क मौसम की सर्द रातें अब मुझको सताती हैं
जो रात को उठकर लिखते थे
वो ख़त अब जलाना चाहिए !!
पहर दर पहर मैं देता रहा तुम को आवाजें
उन आवाजों को अब तो
लौट के आ जाना चाहिए !!
मेरे ख्वाबों की चाँद लाशें सड़ रहीं हैं आज भी
इन की चिता को आग लगाने
तुम्हे अब आ जाना चाहिए !!
शनिवार, 8 मई 2010
नयी कवितायेँ उधार की !
इस कदम से मेरा ब्लॉग भी जीवीत रहेगा और आप लोगो को नयी और उम्दा किस्म की कवितायेँ पढ़ने मिलेंगी। जब स्वयं कुछ लिखूंगा तो आपको लिखने के स्तर से ही पता चल जायेगा और मैं स्वयं इमानदारी से आप को बता भी दूंगा।
तब तक आप लोग इन स्तरीय कविताओं का आनंद उठाएं।
प्राचीन महल का वैभव खंडहर में बदल गया है
कभी तन के खड़ा था हिमालय
सा आज रेत के पर्वत सा बिखर गया
है उसकी इस दशा पर सभी तो मौन हैं
कुछ हमदर्दी दिखाएँ
साथ में दो आसूं बहायें
ऐसा इस अपनो की दुनिया में बताओ तो भला कौन है
मैं हमदर्दी हो सकता हूँ
थोड़ा साथ दे सकता हूँ
पर आंसू बहाने को मुझसे मत कहना
मेरे आंसूं सुख चुकें हैं
कुछ जमा है फिक्स डेपोसित में
ताकि अपनी ही मौत पर फूल न चढ़ा सकूं
बाज़ार से खरीदा कर
तो अपने आंसू तो बहा सकूं
हाँ, मेरा स्नेह नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
क्यूँ की चौराहे की हवा अब सहन नही होती
मेरी लौ होती है विचलित
होती है कम्पित
मेरा स्नेह अभी नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
तुमको करना है प्रकाशित
आतीत के वैभव को
मेरा क्या!मैं तो टोटके क़ा दीपक हूँ
मेरा बुझ जाना ही अच्छा!
लो! मैं बुझता हूँ।
सोमवार, 24 अगस्त 2009
अनकही
दर्द वो है जो दीवारों सा दिखायी नही देता
बादलों सा बरसता तो है झूम के
पर बारिशों सा सुनायी नही देता
दिल के दरख्तों में
मैंने सपनो के बीज बोए थे
गम की फसलों के सिवाय यहाँ
अब कुछ दिखायी नही देता
सोचता हूँ की मांगूं बादलों से
थोड़ा पानी अपनी आँखों के लिए
पर सुना है की अब बदल कोई भी
यूँ ही उधार नही देता
रात के अंधेरे में किसी
रौशनी को उम्मीद न समझो
जलने के लिए कोई तिनका
अपना जिस्म बार बार नही देता
रास्तों पे चलते कारवां को
यूँ ही मंजीलें नही मिलती
नसीब मंजिलों का भी तो
देखो जिन्हें कारवां
हरबार नही मिलता …..
अब क्या करें
बदले नही अपने हालात तो अब क्या करें
कैसें दे अब चिरागों को हम होंसला
हवाएं हो गई है बेबाक तो अब क्या करें
तुम बताओ की परदों के पीछे क्या है
तुम बस परदों से करते रहे बात तो अब क्या करें
चैन की नींद में मैंने कुछ सपने उगाये थे
फसलें बिक गई अपनी तों हातो हाथ तो अब क्या करें
चाँद बुझ के सो गया , तारें जमीन पे आ गए
जिंदगी चलती रही रातों रात तो अब क्या करें
मैं तेरी यादों को माय समझ के पी गया
बातों में बस बढ़ गई बात तो अब क्या करें
बुधवार, 19 अगस्त 2009
मेरे घर के कमरे में
मेरे घर के कमरे में बिखरे हैं ख्वाब कुछ
आओ मिल कर समेटे आज कुछ
दरियों के नीचे से सपनो की धूल निकाले
तकियों के गिलाफों से उष्णता के फूल निकाले
रोशनदानो से बाहर देखे आज कुछ
मेरे घर के कमरे में.......
यादों के पौधों को थोडी सी धुप दिखा दें
अलमारी को किताबों की तहजीब सिखा दें
टूटे कांच में देखे आईने की तरह आज कुछ
मेरे घर के कमरे में .......
कमरे के फर्श को नए विचारों से धोया जाए
इसका कोना कोना नई उम्मीदों से संजोया जाए
घर की चौखट पे रंगोली से लिखें आज कुछ
मेरे घर के कमरे में बिखरे हैं ख्वाब कुछ..
ओल्ड
यूँ गुजर रही जिंदगी उसका ही नाम लेकर
मैं आज भी बैठा हूँ महफिल में एक टूटा जाम लेकर
तुम सजाओगी कभी महफिल मेरी मजार पर
कफ़न में लेटा हूँ आज भी मैं तेरी महफिल के दाम लेकर
बुधवार, 10 सितंबर 2008
सपने
सपने तुम्हारे
मैं बाज़ार में
और फिर खरीद लाता
चन्द रोटी के टुकड़े
जो गिरते नही आस्मां से
आंसुओं को सुखा के
नमक कर लेता
अपने दर्द को पी के
मैं दम भर लेता
काश भुला सकता तो भुला देता
मैं जो ठगा गया
यहाँ सपनो के
बाज़ार में
जहाँ सपने खरीदे जा सकते हैं
पर बिक नही सकते
मैं तनहा सुखी नदी
के किनारे खड़ा
सोचता हूँ की
ये नदी बहती यदि
तो बहा देता सपने सारे
और चुका देता कीमत
धरातल के खुशियों की
बेनाम
हम शान से जीतें हैं गाया नहीं करते
यूँ तो होंगे कई फनकार तेरी महफिल में
हम यूँ ही अपना हुनर जाया नही करते
चाँद के पास ही रक्खा है दिल मेरा हुजुर
ऐसी बातों से ज़माने को बहलाया नही करते
मैंने कमरे में बिछाये हैं यादों के कई बिस्तर
यहाँ हर कसी को हम लिटाया नही करते
महफिल महफिल लोगों को हम गले लगाया करते हैं
उनकी बातों को मगर दिल से लगाया नही करते