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सोमवार, 14 अप्रैल 2014

ख्वाब

मस्तक पटल से यादों की धुंध साफ़ नहीं करता 
मैं अब भी पश्मीने की मुंडेर पे रहता हूँ 
बहते कोहरे में चाँद को देखना शौक अब भी है मेरा मेरा 
मैं अब भी सर्द रातों में सुखी नज़्में जलाता रहता हूँ 
कोई गिला, शिकवा, शिकायते गायी न गयी 
ये अभी अच्छा ही हुआ कि
 कोई वादा, वफ़ा, कसम निभायी न गयी 
सूखे पत्तों की तरह अपने ही पेड़ की शाखों के 
निचे बिखरता रहता हूँ 
मैं वक़्त को तेह कर के उम्र की दराजों में 
रखता रहता हूँ 
ये वक़्त मेरी उम्र की तहों में सिक कर 
जब तजुर्बा बन जायेगा 
मैं इस पश्मीने की मुंडेर से उठ जाऊंगा 
और उस चाँद के पास जाकर बैठूंगा 
ऐसे ही कुछ ख्वाब है जिन्हे 
अक्सर कागजो पे लिखते रहता हूँ  मैं

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

अच्छा होगा

आँखों से बहो और दिल से निकल जाओ तुम तो अच्छा होगा 
रहो मेरी तन्हाई से दूर और मुझे ना याद आओ तुम तो अच्छा होगा 

अच्छा होगा तुम्हारा ना मिलना मुझसे हमेशा के लिये 
मेरे कमरे से अपनी यादें समेट जाओ तुम तो अच्छा होगा 

मेरी आँखों को अब रोशनी की आदत भी नहीं 
मेरी अंखों के आईनो से अपना अक्स ले जाओ तुम तो अच्छा होगा 

कोई बहाना नहीं है

तुमसे बात करने का अब कोई बहाना नहीं है
और ब्लॅंक कॉल करने का अब ज़माना नहीं है

दिन के जुगनू रातों को आवारा से फिरते लेकिन 
ना दिन को फुरसत है और रातों का भी अब ठिकाना नहीं है 

एक अर्सा हुआ यारों की मेहफिलों का चाँद हुए 
सब्जी मॅंडी से आगे अब अपना आना जाना नहीं है 

तेरे खत और तस्वीर तेरी फाड़ दी थी उसी दिन 
सोना है सुकून से, अब बीवी से कुछ छुपाना नहीं है 

मेहफ़ूस रखना अपने दिल के किसी कोने में तुम मुझको 
सच्चे आशिक़ है हम, तुम्हारे बच्चों के मामा नहीं है 





भीड़

तुम केवल एक भीड़ हो 
एक चिल्लाने वाली भीड़ का हिस्सा हो
तुम केवल चिल्ला सकते हो 
दात भीच सकते हो 
तुम एक निराशक भीड़ हो
तुहारा अपना कुछ नहीं 
जो है सब भीड़ है
चिल्लाते हो उनके खिलाफ 
जो तुम्हारी भीड़ ने चुने थे कभी
तुम्हारा वज़ूद भीड़ है 
और आधार भी भीड़ है
अकेले तो तुम इतने सालों से 
कहीं किसी बियाबान में 
उन्ही की भीड़ का हिस्सा थे 
जो कहानी तुम अब बता रहे हो समाज को
उसी कहानी का तुम भी एक किस्सा थे 
वज़ीर से शह पाकर प्यादों ने भी 
सीख लिया है अब हर चाल चलना 
ये भीड़ का रूख है अभी 
और आगे  फिर तुम्ही को है सम्हलना 
खुद अपनी ही सीमाये बना ली है तुमने 
अब अवसरवादी भीड़ भी बना ली है तुमने
तुम एक पढ़े लिखे इंसान हो
जवान हो या किसान हो 
थोड़ा सम्हलो और अपने अंतर्मन में झाको 
इस भीड़ को और भीड़ मत बनाओ तुम
बड़ी मुश्क़िल से साठ सालों में इस भीड़ में
इंसानी समाज की खूबियाँ देखी है 
पतन भी देखा और तरक्की भी देखी है  
तुम्हारा म्हातवाकांशी होना बुरा नहीं
बुरा है उस पर भीड़ की शक्ति का तंदूर बनाना 
और बुरा है उस तंदूर पर सत्ता की रोटी सेकना!!! 



मंगलवार, 21 जनवरी 2014

AAP se kuch kehna hai

२०११ में जब केजरीवाल जब मंच पर  खड़े हुए थे तब राजनीती के चेहरे पर भ्रष्टाचार के मुहासे का इलाज करने वाले स्पेशलिस्ट डॉक्टर कि तरह नज़र आये थे लेकिन अब लोकतंत्र के पटल पर अब वो खुद मुहासा बन गए है।  ईमानदारी के सर्टिफिकेशन का जो नेक्सस वो चला रहे थे उसका दरसल भांडा फूट गया है।  कांग्रेस ने चुनाव के बाद जो जाल बिछाया था उसमे केजरीवाल अब फंसते नज़र आ रहे है।  दिल्ली कि सियासत न उनसे निगली जा रही है न चबाते ही बन रही है।  वो एक सफेदपोश है जो अपनी गलती छुपाने के लिए दूसरे कि दाड़ी में तिनके निकाल रहे है।

शुरुआत से शुरू करे तो आम आदमी तक जाना पड़ेगा।   चुनावी वादा पहले खुद के लिए किया कि कोई मंत्री लाल बत्ती नहीं लगाए,गा महंगी कार में नहीं घूमेगा, सरकारी बंगला नहीं लेगा।  आप सचिवालय चले जाईयें वादा खिलाफी देख लीजिये।  मैं कुछ नहीं कहूंगा। जहाँ तक सरकारी बंगले ई बात है तो वादा निभाया गया है। शाब्दिक रूप से कम से कम वादा निभाया है। बंगले नहीं है लेकिन फ्लैट है और मेरी नज़र में बंगले से ज्यादा खूबसूरत है। केजरीवाल भी इस फ्लैट कि मोह माया में आ ही गए थे लेकिन फिर मीडिया चैनल्स ने उनकी वादे वाली क्लिपिंग्स दिखा दिखा कर उन्हें फ्लैट न लेने पर मजबूर कर दिया।   अजीब सी बात है जिस मीडिया ने उन्हें बनाया है अब वो ही उन्हें खींच रही है।  दरसल सच्चा विपक्ष मीडिया ही होता है।  

 केजरीवाल उवाच ऐसे छोटी छोटी बातों पे ध्यान देंगे तो फिर बड़ा उद्देश्य कैसे पूरा होगा।  गाड़ी ले ली कोई बात नीं।  घर ले लिए कोई बात नीं।  इसे वादा खिलाफी मन नहीं माना जायगा।  लेकिन सर सोमनाथ भारती देश के इतने बड़े सम्मानीय व वरिष्ठ वकील जिन्हे अपैक्स कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने सम्मानित किया है वो अगर जासूस बन कर दिल्ली कि सड़कों पर महिलाओं को रस्सी से बांधेंगे प्रताड़ित करेंगे तो फिर कैसे चलेगा। सोमनाथ जी गए थे छब्बे बनने और लौट कर आये अबे बन कर। पुलिस को काम सिखाना चाह रहे थे, दरसल मीडिया से पुलिस का स्टिंग करवाना चाहते थे लेकिन उलटे धरे गए।  फंस गए तो फिर केजरीवाल को मोर्चा सम्भालना पड़ा।  जैसे हार्डवेयर इंजीनियर हर यूजर को पहले कंप्यूटर ऑफ कर के ऑन करने के लिए कहता है उसी तरह केजरीवाल पहले धरने करते है फिर बात करते है, सो धरना शुरू हो गया।  जनता तो टोइंग है केजरीवाल कि जेब में है , एक आवाज़ पे अपना काम छोड़कर आ जायेगी।  लेकिन जनता तो सचिवालय से कब कि ऊब के जा चुकी है।  पहले सर्कार बनाये या नहीं फिर आपकी शपथ में खामा खा कि शपथ और फिर जनता दरबार में जनता बड़ी बेआबरू होकर निकली।  अब जनता बार बार थोड़ी न आएगी आपके वरगलाने में. आप सड़क पे सोये या अपने घर में जनता को अब फर्क नहीं है।  २६ जनवरी को छुट्टी है।  सुबह सरकारी ऑफिस में लड्डू मिलेंगे और टीवी पे परेड आएगी आप हमारा मजा ख़राब मत कीजिये।  अगर सचमुच में मुख्यमंत्री है तो बंद गले का सूट सिलवाने दाल दीजिये २६ जनवरी का मुख्यमंत्री का ड्रेस कोड है।  और मेहरबानी करेंगे तो टीवी पर भी २६ जनवरी को कोई गांधी जी कि पिक्चर देख लेंगे।

धन्यवाद् 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

गलिचा

कटी फटी ज़िन्दगी के कई हिस्से मिल गए है
एक सर्द रात में इन्हे मखमली नज़्म में सिल दूंगा
उल्झे  रिश्ते के सीधे धागो से यादों के बटन ताकूंगा
कुछ अपने आंसुओं के छल्लों कि माला पिरोऊँ गा
अपने दर्द से ढाक दूंगा मैं  फटे हिस्से
तुम्हारी आँखों के बादामी  रंग मैं इसमें भरूंगा
रात गर काली गयी तो बादाखाने के
कुछ रंग भी आयेंगे नज़र
जो गर रही चांदनी तो फिर
फिर सब इसे  रिश्तों का
गलिचा समझ बैठंगे 

ख़त

तेरी खूशबू में बसे ये  ख़त
तेरी यादों कि आँधियों को समेटे ये ख़त
तेरी पलकों कि नमी से भीगे ये ख़त
तेरे मेरे बीच में केवल ये ख़त
अब जलाकर इन्हे कुछ न हासिल होगा
थोडा कुछ होगा भी तो बस धुआं होगा। 

बेक़रारी है

कैसी उलझन है ये कैसी बेक़रारी है
दिन तो गुज़र  जाता है यूँ ही
पर ये एक रात बहुत  भारी है

 मुद्दतों से मैंने कोई बाज़ी
खेली ही नहीं पर ज़िन्दगी
 यूँ ही रोज़ रोज़ हारी है

आइना देखा तो जाना आज
कि एक वक़्त गुज़र गया
तमाम उम्र यूँ ही तनहा गुज़ारी है

सीने में पहले कुछ अरमान सुलगा रखे थे
अब होटों पे रखे है और सुलगना जारी है

वो नशे भी अब खाली होकर कांच हो गए
बेक़रारी है बेक़रारी है बेक़रारी है

सोमवार, 24 जून 2013

एक और नमाज़ी डूब गया

इबादतगाह में देखो एक और नमाज़ी डूब गया
दुआ मेरी भी कबूल हुई, एक गैर समाजी डूब गया

कैसे मंदिर, कैसी मस्जिद, जगह सब ठेकेदारों की है
पाप धोते धोते वो, एक और रिवाजी डूब गया

उमड़ते ये सैलाब नहीं, ये ऊपर वाले की बोली है
बाकि तो सब समझ गए थे, वो एक न-समाझी डूब गया 

सैलाब खुदा के भी घर में

खुदा के रास्ते पे यूँ ही  मत चला करो
किसी शाम हम से भी मिला करो 

आते हैं सैलाब खुदा के भी घर में 
तुम शामों को अक्सर,  मयकदों में मिला करो

अक्सर याद आती है वो,  गर इबादत के दर्मियान
कर के वजू फिर तुम, उसके ही सजदे किया  करो

जो तुम सब को दिखलाते हो, वो तुम तो नहीं कोई और है
खुद तुम, खुद बनकर रहा करो, जब तुम  मुझ से मिला करो