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शुक्रवार, 11 मई 2007

ये किस मुकाम पे आ गए हो तुम

ना जाने किस मुकाम पे आ गए हो तुम
पाना था किसे, किसे पा गए हो तुम

राह जो रात भर चलती रही अब खामोश और परेशान है
उस राह को छोड कर किन पगडंडियों पे आ गए हो तुम

एक चांद कहीँ ठहरा है एक रात कहीँ बाक़ी है
जागी रातों कि नीद में अब आ गए हो तुम

ये किस मुकाम पे आ गए हो तुम

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