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रविवार, 31 जनवरी 2016

सपने

मुझे मेरे सपने अब मिला नहीं करते
कई मौसम बदले मेरे शहर के लेकिन
फूल वो दिलों वाले अब खिला नहीं करते

पत्थर हो गए इंसा सब के सब
अब यहाँ ईद पर गले मिला नहीं करते

बच्चों सी है बातें इनकी
इनकी बातों का अब हम गिला नहीं करते

तार तार  हो गया है जिस्म छिल कर
जख्म कोई भी हो अब हम सिला नहीं करते।

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