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सोमवार, 25 जनवरी 2016

मेरे अंदर कौन है

मेरे अंदर कौन है बाहर कौन
मुझे जाना कहाँ है अब ये बतलाये कौन

शराबों के कई दौर यूँ ही ज़ाया हो गए
बात वो पते की अब सबको बतलाये कौन

वो गाँव सब के सब अब शहर हो गए
पर नींद वो गावों की अब शहरों में उगाये कौन

कल मयकदों से निकलकर  सब खुदा हो गए
दीवार ओ दर मस्जिदों की देखने अब रोज़ रोज़ जाये कौन

दोस्त तुमसे दोस्ती मेरी वैसी ही है गहरी
पर कौन जाए रोज़ मिलने किसी से
और रोज़ किसी को फ़ोन लगाये कौन।

मेरे अंदर कौन है बाहर कौन
मुझे जाना कहाँ है अब ये बतलाये कौन

अंशुमान 

सोमवार, 22 जून 2015

जिंदा किताबें

जिस्म रूह पर ऐसे है
पुरानी किताब पर
जिल्द चढ़ी हो जैसे
उम्र बढ़ रही है
तो वो कोने जो
अक्सर अलमारी
से रगड़ खाते है
छिल जाते  हैं
इस जिल्द पर
वक़्त की जो
धूल जमी है
वो आंसुओं की
बरसात में जब
भीग जाती है
तो उससे पुराने
वक़्त की सौंधी
खुशबु आती है
भिगाकर जब
सूख जाता है
नमकीन पानी
तो इस जिल्द पर
झुर्रियां निकल आती है
वैसे तो इस
किताब को अब
कोई पढ़ता नहीं है
कभी कोई अपना
छू लेता है
चंद सफ़हे पलट
लेता है और फिर
वापस रख देता है
कई बार तहज़ीब से
अलमारी से बाहर
झांकती इन किताबों की
यूँ तो कोई उम्र नहीं होती
लेकिन ये बहुत जगह
घेरती है दराजों में
जब ये रद्दी भी
न हो घर से बाहर
जाने के लिए
तो अक्सर लोग
इन किताबों को
जला देते है

जिस्म रूह पर ऐसे है 
पुरानी किताब पर 
जिल्द चढ़ी हो जैसे 







बुधवार, 10 जून 2015

पेचीदा से रिश्तेदार

यार तुम बड़े ही पेचीदा से रिश्तेदार हो
मिलकर भी कभी मिलते नहीं
चहरे तुम्हारे कभी खिलते नहीं
माना की तुम बड़े हो,
होशियार हो
यार तुम बड़े ही.………

मेरे बारे में,  मुझे छोड़कर
सबसे मुखातिब होते हो
छोटी छोटी बातों में
बच्चों की तरह रोते हो
यार तुम बड़े हो
होशियार हो
 लेकिन तुम बड़े ही। …

दीवारों पर सीलन की तरह
मत आया करो
और इल्जाम  बारिशों पर
तो बिलकुल भी
मत  लगाया करो
क्यों किसी से डरते हो
तुम तो खुद
अपनी सरकार हो
यार तुम बड़े ही.………

खुदा का खौफ रक्खो
मेरे बच्चों को
अच्छे तोहफे
दिया करो
बहुत असर होता है,
बुजुर्गो की दुआएं
लिया करो
कहीं ऐसा न हो कि
तुम्हारे पुरखों के
हश्र को तुम्हारा
इंतिज़ार  हो

यार तुम बड़े ही पेचीदा से रिश्तेदार हो






शुक्रवार, 5 जून 2015

वहां कोई होता तो होगा

पहाड़ों की चोटियों पर रात को 
कोई सोता तो होगा 
यहाँ तक आते हैं 
वहां के सन्नाटे 
कोई जरूर वहां 
रोता तो होगा 
इन घुमावदार रास्तों पर 
कई बार पानी को 
उतरते देखा है 
कई बार यहीं से 
कोहरे को ऊपर 
चढ़ते देखा है 
किसी को तो 
जाती होगी ये रसद 
वहां ऊपर जरूर 
कोई होता तो होगा 
चोटियों पर पहले 
आती है धूप 
किसी को तो 
जगाने  के लिए 
रजाई तान कर रात भर 
कोई वहां सोता तो होगा 




मंगलवार, 26 अगस्त 2014

उदास

मेरे शब्द उदास है
मन के किसी कोने में
रूखे हुए कुम्हले हुए
अपने दिन काट रहे है
मन के आँगन में
अब ये खेलते नहीं है
दिन ब दिन सिकुड़ जाते है
पर किसी की आहट पे
अब ये फैलते नहीं है
काली स्याह रात सा
मुक़द्दर रहा है इनका
चाँद सा मेहबूब रहा
तो उछले नहीं तो
ज़िन्दगी तिनका तिनका
अतीत की मशालों में
जलकर इन्होने
कई महफिले
रोशन की है अब
कुरेदता हूँ तो बस
राख है महफिले
कहीं नहीं है
वो जो मुह पे
रहते है दो चार
मेरे खास है
वैसे बहुत दिनों से
मेरे शब्द उदास है

बुधवार, 20 अगस्त 2014

अपने आप से

आज जो थोड़ा वक़्त मिला
तो गौर से आइना देखा
और जाना की वो शख्स
जो तमाम उम्र मेरे
साथ साथ चलता रहा था
ज़िन्दगी की खीच तान में
कहीं पीछे रह गया है
मैं अकेला बहुत
अकेला जी रहा हूँ

मैं जब बहुत छोटा था
तो तुम मेरे साथ हो लिए थे
नए नए खेल
सिखाते  थे
तुम मुझको
एक बार जब छत की
मुंडेर पे चढ़ गया था
तो तुमने मुझे
पकड़ लिया था अपनी
दोनों कलाइयो में
मुझे जप्त कर लिया था
मैं जब कभी अँधेरे से
डर  जाता था तो तुम
मुझे होंसला दिया
करते थे

स्कूल में भी तुम
मेरे साथ ही थे एकदम
रातों को जागकर जब
मैं पढता था तो तुम
कभी कभी आ जाते थे
मुझे देखने के लिए
तुमने ही मुझे उसूलों
की जगह जज़्बातों को
निभाना सिखाया है

वो भूरे आँखों वाली लड़की
जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी ,
तुमने ही तो बताया था की
मुझे उससे प्यार हो गया है
याद है उससे घंटो बाते करने के बाद
मैं घंटो तुम्हे उसकी एक ही बात
बार बार बताया करता था
पर तुम न कभी बोर हुए
न कभी इर्रिटेट हुए

बारिशों में घर से निकाल  देते थे
तुम मुझे भिगोने के लिए
और इसी तरह कई बार
मैंने भी अकेले मैं
आंसुओं से भिगोया है तुमको

मैं ये मानकर ही चल रहा था
की तुम मेरे साथ ही हो
पर आज अकेले में
कोई नहीं है
न तुम्हारी ख़ामोशी है
ना ही तुम्हारे सन्नाटे
और आइना देखा तो जाना कि
अकेला बहुत अकेला जी  रहा हूँ मैं !!






शनिवार, 5 जुलाई 2014

परिचय

कागज़ पर कलम से दिल के शोर लिखता हूँ
मुझसे जब उलझ जाते है ज़िन्दगी के सवाल
मैं खामोशी से बहुत घनघोर लिखता हूँ

सुलझा रहा हूँ उलझनों को,
ज़िन्दगी को कमिंग सून लिखता हूँ
बादल बारिश सावन सब देखे है मैंने
पर आँख नम हो जाये तो मानसून लिखता हूँ

आँधियों में फड़फड़ाता सहर का चिराग लिखता हूँ
रेत, पानी सब आग बुझाने के लिए है
मैं समंदर की गीली रेत पर आग लिखता हूँ

ज़िन्दगी के तजुर्बे से जवानी की शान लिखता हूँ
खत्म करता हूँ  जब लिखने के सिलसिले
आखिरी में अंशुमान लिखता हूँ




सोमवार, 26 मई 2014

ओल्ड ऐज होम

असंख्य झुर्रियों से
जरा सा ऊपर
दो कैटरेक्ट वाली आँखें
अब किसी का
इंतज़ार नहीं करती
ना कोई आया कभी
यहाँ न कोई आएगा
अपनो का खौफ
अब इतना है
कि अकेलापन
अब क्या रुलाएगा

अतीत के गौरवशाली
दिन मन के किसी कोने में
दुबक कर बैठ गए है
किसी को बताऊँ तो सही
पर वक़्त पे अपना नाम
भी याद नहीं आता
बच्चों के नाम याद है
रोज़ पेपर के पीले
पन्नो  पर  छपते है
पर शर्मसारी की
वजह से किसी को
नहीं बताता

मैं पोस्ट ऑफिस
में बाबू था
रबर की चप्पल में
अर्धशतकीय धागे डालकर
बच्चो को  अंग्रेजी
जूते  पहनता था
बच्चों को कॉलेज में
नए कपडे नसीब हो
तो सालों साल
वो बड़े चेक की
शर्ट चलाता था

जब बड़े को
बड़े कॉलेज में
दाखिला लेना था
तो उसकी माँ ने झट से
उतारकर अपने कंगन दे दिए थे
मैंने भी दो चार दोस्तों से
कुछ पैसे उधार ले लिए थे
वक़्त बीता तो माँ ने अपने
हाथों को कांच के कंगन से
ढक लिया था
मैंने भी दोस्तों का पैसा वापस
उनके सामने रख दिया था

जब छोटे की बारी आयी
तो माँ के पास कंगन नहीं थे
मैं रिटायरमेन्ट के पास था
दोस्तों ने हाथ खड़े कर दिए
वो भी अपनी जगह सही थे
इससे पहले की वो सोचे
अपने मंगलसूत्र के बारे में
मैं निकल लूंगा पीएफ अपना
समझाया मैंने उसे इशारे में
बच्चे ही अपनी संपत्ति है
बच्चे ही सच्चा धन है
बच्चों को अगर पढ़ा  भी
न पाये तो फिर क्या जीवन है

पढ़ लिखकर बच्चे बड़े हो गए
अपने पैरों पर दोनों खड़े हो गए
हम भी दिन में छाती पर
अख़बार रख कर सो जाते थे
कैसे बड़ा किया बच्चों को
सबको  गर्व से सुनाते थे

बच्चे बड़े हो गए
समझदार हो गए
बड़े शहरो के
कंक्रीट के जंगलों में
कहीं खो गए

पहले पैसे आते रहे
फिर केवल खत आने लगे
दिन में देखे सपनो के बादल
बिन बरसे ही जाने लगे
एक दिन
आंसुओं का सैलाब
ऐसा आया कि
किराये का घर था
वो बह गया
माँ के पास कुछ था नहीं
मेरे पास भी बस
तजुर्बा ही रह गया

अब तो यही आशियाना है
अब बस यहीं बसर होगी

बचे कुचे दिन बस सांस
लेने  में यहीं कटेंगे
अपनी अपनी मटकी
ले  आये हैं
हम दोनों अब
यहीं मरेंगे

सुबह शाम यहाँ सब्ज़ी देने
मख़्दूम आता है
कुछ देर बात कर लेता है
तो दिल बहल जाता है
कल कहता था कि
जल्दी जाना है
घर पर अंधी माँ
के लिए खाना बनाना है

अंधी माँ का खाना?
हाँ, बाबूजी !
गरीब के पास केवल तन होता है
और माँ बाप ही जीवन का
असली धन होता है

दांत भींचकर मैंने
सोच लिया कि
आंसुओं को बहने का
अब कोई बहाना न दूंगा
मर कर राख भी हो जाऊं
तो फिर राख भी बच्चों को
हाथ लगाने न दूंगा












शुक्रवार, 23 मई 2014

पीछे का कमरा

अब किसके पास वक़्त है यहाँ
अब कौन जनाजे में रोता है
आज आफिस में काम  बहुत है
और एक दिन तो सबने मरना होता है

 ये तो इस कॉलोनी में रोज़ का लगा रहता है
आज किसी का बाप मरा है और कल किसी का चौथा है
उनके जीते जी न गए हम कभी
अब जनाजे में जाने से क्या होता है.

यूँ ही नहीं मैंने अपनी
ये दुनिया बनायीं है
अपनी सांस से  सांस रगड़कर
इस घर की इंट इंट बनायीं है
देखो इस हवादार  मकान को
इसका  मारबल मकराना से लाये थे 
दीवारों को सजाने के लिए 
कारीगर आगरा से बुलाये  थे 
बाहर के कमरे से सनराइज
और टेरेस से सनसेट होता है

पीछे का कमरा????????
उसे बंद ही रहने दो यार
पीछे का कमरा तो
बूढ़े माँ बाप के लिए होता है
हाँ, वो छोटी सी रसोई भी
उन्ही के लिए है
उन बर्तनो को भी हम
हाथ नहीं लगाते
एक छोटू रखा है इनके लिए
वो ही इन बर्तनो
को धोता है

माँ बाप को हम जनरली
मेहमानो से नहीं मिलवाते
माँ जो कम सुनती है
अपने में खो जाती है
बाप खासते ही रहते है
तो सिचुएशन
ऑक्वर्ड हो जाती है

कुछ गरीब रिश्तेदार है
जो कभी कभी इनसे
मिलने आते है
ये जाये  और जाकर
अब रहे छोटे के घर
हम दोनों अब
ये ही चाहते है

इनकी बातों में
बच्चों का बहुत
समय ख़राब होता है

आजकल की ज़िन्दगी में 
ये कहाँ एडजस्ट कर पाते है
एक उम्र के बाद तो माँ बाप
बस कहने के लिए ही रह जाते है

उनके ज़माने अलग थे
लोगो के पास बहुत वक़्त था
जरूरते भी बहुत कम थी
और कम में ही बसर हो जाती थी
मेरे कपडे छोटा पहनता था
और एक ही निक्कर
कई साल चल जाती थी
सात रुपये किलो दूध और
बीस रुपये लीटर खाने का
तेल आता था
कुछ भी मीठा बना हो घर में
पड़ोसियों में बांटा जाता था

पडोसी साले दगा दे गए
कभी फुर्सत में बताऊंगा

बातें ये बरसोँ की है
जेहन में चिपकी है ऐसे
जैसे बस  ये परसो की है

खैर !! जीवन है ये
और ये ऐसे ही
 चलता रहता है
आँखों के कोरो से रिसता हूँ
देर तक जब मेरा बड़ा बेटा
मुझसे आकर ये कहता है
कि पापा पीछे के कमरे में
अबकी दिवाली
आपका फेवरट ब्लू
कलर करवाएंगे
अबकी जो दादा दादी
गए चाचा के यहाँ
तो फिर इसे आपका
इस्टडी रूम बनाएंगे

हाथों से छूटता मेरा वर्त्तमान
अब मुझे मेरे भविष्य
के पास लाने लगा है
टेरेस से सनसेट के बाद
का अँधेरा अब पूरे घर
पर छाने लगा है

पीछे के कमरे का खौफ
अब मुझे सताने लगा है
 

 








सोमवार, 14 अप्रैल 2014

ख्वाब

मस्तक पटल से यादों की धुंध साफ़ नहीं करता 
मैं अब भी पश्मीने की मुंडेर पे रहता हूँ 
बहते कोहरे में चाँद को देखना शौक अब भी है मेरा मेरा 
मैं अब भी सर्द रातों में सुखी नज़्में जलाता रहता हूँ 
कोई गिला, शिकवा, शिकायते गायी न गयी 
ये अभी अच्छा ही हुआ कि
 कोई वादा, वफ़ा, कसम निभायी न गयी 
सूखे पत्तों की तरह अपने ही पेड़ की शाखों के 
निचे बिखरता रहता हूँ 
मैं वक़्त को तेह कर के उम्र की दराजों में 
रखता रहता हूँ 
ये वक़्त मेरी उम्र की तहों में सिक कर 
जब तजुर्बा बन जायेगा 
मैं इस पश्मीने की मुंडेर से उठ जाऊंगा 
और उस चाँद के पास जाकर बैठूंगा 
ऐसे ही कुछ ख्वाब है जिन्हे 
अक्सर कागजो पे लिखते रहता हूँ  मैं